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कांग्रेस‑सीजेपी के बीच दूरी और एएपी के विरोध प्रदर्शन की अलग पहचान

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आम आदमी पार्टी (एएपी) का उदय 2012 में कांग्रेस के विरोध से हुआ, जबकि 2013 में कांग्रेस के समर्थन से अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। उस वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में एएपी को 28 सीटें, भाजपा को 31 और कांग्रेस को 8 सीटें मिलीं, और एएपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई। यह गठबंधन केवल 49 दिनों तक चला; फरवरी 2015 के चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया।

एएपी की वर्तमान राजनीतिक स्थिति

विश्लेषकों का मानना है कि एएपी कांग्रेस के लिए भाजपा से अधिक खतरा बन चुका है, क्योंकि जहाँ भी एएपी सत्ता में आई है, उसने कांग्रेस को हराया है, पर भाजपा को हराने में सफल नहीं हुई। वर्तमान में कांग्रेस केंद्र में हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़कर बाहर है, जबकि एएपी का मुख्य मुकाबला भाजपा से है, सिवाय पंजाब के जहाँ एएपी सत्ता में है और वह कांग्रेस से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। दिल्ली और पंजाब के अलावा एएपी की ठोस मौजूदगी नहीं है, जिससे वह दोनों ही पार्टियों के विरोधी के रूप में प्रस्तुत होता है।

सीजेपी‑कांग्रेस के मतभेद

जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस की सीधी भागीदारी नहीं थी। लोकसभा में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के आवास के बाहर धरने पर बैठकर विरोध किया, जिसे एएपी ने आलोचना की। एएपी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने एक्स पर आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी को धरने पर बैठाकर सीजेपी के आंदोलन को कमजोर किया।

मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विवाद

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस और एएपी दोनों ने आपत्ति जताई, पर कांग्रेस की अभियान में अरविंद केजरीवाल शामिल नहीं थे। कांग्रेस ने आयुक्त के इस्तीफे, एसआईआर रद्द करने और ईवीएम के बजाय बैलेट वोटिंग बहाल करने की मांगें रखी। इस बीच सीजेपी ने चुनावों का बहिष्कार करने की अपील की, जिससे चुनावों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।

  • कांग्रेस: आयुक्त का इस्तीफा, एसआईआर रद्द, बैलेट वोटिंग।
  • सीजेपी: चुनावों का बहिष्कार, भाजपा को लाभ।

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