मुंबई। हिंदी सिनेमा जगत में इन दिनों फिल्मों के बेतहाशा बढ़ते बजट और बॉक्स ऑफिस पर उनकी घटती रिकवरी को लेकर गंभीर मंथन शुरू हो गया है। हाल के दिनों में रिलीज हुईं कई मेगा-बजट फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में नाकाम रही हैं, जिसके चलते फिल्म निर्माताओं और थिएटर मालिकों के बीच मुनाफे को लेकर तनाव बढ़ गया है।
इस संकट की सबसे बड़ी वजह बड़े सितारों की आसमान छूती फीस और उनके निजी स्टाफ पर होने वाले अत्यधिक खर्च को माना जा रहा है। कई प्रमुख फिल्म निर्माताओं ने अब सार्वजनिक रूप से यह मांग उठाई है कि अभिनेताओं को अपनी निश्चित फीस घटाकर ‘प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल’ यानी फिल्म के मुनाफे में हिस्सेदारी पर काम करना चाहिए। इसके अलावा, दर्शकों के बदले मिजाज ने भी उद्योग को सोचने पर मजबूर कर दिया है; केवल बड़े सितारों के चेहरे पर कमजोर कहानियों को दर्शक सिरे से नकार रहे हैं।
दूसरी ओर, महंगे मल्टीप्लेक्स टिकटों और खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के कारण आम परिवार थिएटर्स से दूरी बनाकर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर फिल्मों के आने का इंतजार करने लगे हैं। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बॉलीवुड ने अपनी उत्पादन लागत को नियंत्रित नहीं किया और केवल कहानी पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, तो आने वाले समय में फिल्म निर्माण का आर्थिक ढांचा पूरी तरह चरमरा सकता है।
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