नाना पाटेकर ने वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले के साथ एक साक्षात्कार में कहा था,"अगर ये लोग मेरी ज़िंदगी में नहीं आए होते, तो शायद मैं अंडरवर्ल्ड में होता।" यह बयान उनके बेबाक अंदाज़ को उजागर करता है। उन्होंने अपने बचपन, संघर्ष और सिनेमा में मिले अवसरों के बारे में खुलकर बताया।
बचपन और गरीबी की कहानी
नाना का जन्म मुंबई में गजानन पाटेकर के घर हुआ, जो कपड़े का व्यापार करते थे। व्यापार में धोखाधड़ी के कारण सब कुछ खो जाने के बाद परिवार गरीबी में धँस गया। सातवीं कक्षा में माँ ने उन्हें अपनी बहन के घर, मुरुड‑जंजीरा में भेजा जहाँ समुद्र के किनारे उनका बचपन बीता। आठवीं कक्षा में मौसी ने उन्हें वापस बुला लिया। उन्होंने कहा, "मुझे हर चीज़ को भव्यता में देखने की आदत हो गई थी, छोटा नहीं देखता। अगर बनना है तो समुद्र जैसा बड़ा बनना चाहिए।"
किशोरावस्था में उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में काम शुरू किया, महीने की 35 रुपये की तनख़्वाह और एक बार का भोजन मिलते थे। पिता के कपड़े के कारोबार के बंद होने के बाद पेंटर की नौकरी की और फ़िल्म पोस्टर भी बनाते रहे। दादर के समर्थ विद्यालय में पढ़ते हुए वह रोज़ दो बार, प्रत्येक 8 किमी, कुल 16 किमी पैदल चलते थे।
सिनेमा में कदम
नाना की पहली नाटक‑रिहर्सल में सुलभा देशपांडे ने अरविंद देशपांडे से कहा कि वह यह भूमिका निभाएगा। इस अवसर ने उन्हें मंच पर स्थापित किया। बाद में उन्होंने मराठी और हिन्दी फ़िल्मों में नायक, सहनायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता के रूप में काम किया। उनका निर्देशन‑डेब्यू फिल्म "प्रहार" था, जहाँ उन्होंने आर्मी के प्रति अपने बचपन के सपने को दर्शाया।
विजया मेहता को उन्होंने अपना गुरु माना और अरविंद तथा सुलभा देशपांडे के योगदान को अपने व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण बताया।
अशोक सराफ के साथ रिश्ते की झलक
अशोक सराफ ने नाना पाटेकर को कई मौकों पर मदद की। पाटेकर ने बताया कि सराफ अक्सर गणपति के लिए विशेष रूप से पैसे देते थे, और जब वह पैसे लौटाने जाते तो सराफ मज़ाकिया अंदाज़ में पूछते, "क्या पाटेकर, पैसे वाले हो गए?" पाटेकर ने कहा कि वह सराफ के पैर दबाते और दो‑तीन रुपये की छोटी‑छोटी मदद लेते। सराफ की किताब "बहुरूपी" में नाना द्वारा एक कठिन शो "हमीदाबाई की कोठी" के दौरान सराफ को साइकिल‑रिक्शा से बाहर निकालने की कहानी लिखी गई है।
अंतिम विदाई
गुरुवार, 8 अक्टूबर को सुबह 5:20 वजे नाना पाटेकर का गोवा के डोना पाउला में स्थित अपने घर पर निधन हो गया। उनका जीवन गरीबी से लेकर सिनेमा की चमक तक का प्रेरणादायक उदाहरण बना रहेगा।
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